बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

मंदिर मस्जिद मिट जाने दो, मरघट उनको हो जाने दो ।


मंदिर-मस्जिद मिट जाने दो, मरघट उनको हो जाने दो ,
तुम न रोपो आज शिवालय, शिव को धरती पर आने दो ,
फिर तांडव जग में मच जाने दो, चिर वसुधा को धँस जाने दो ।
- प्रकाश 'पंकज'

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

शुभान्त - एक शुभारंभ


 शुभान्त !   - एक शुभारंभ 

कामनाएँ, मधुर कामनाएँ, शुभ कामनाएँ,
कामनाएँ आपके उज्जवल भविष्य की,
कामनाएँ हर संघर्ष की, संघर्ष में विजय की,
सविश्वास डटे रहने की, ज्ञान से झुके रहने की ।
कामनाएँ अविरत ज्ञानोपार्जन की,
कामनाएँ ज्ञान बांटने की, भटकों को मार्ग बताने की,
मंगल कामनाएँ आपके पथ प्रदर्शक जीवन की ।

इच्छाएँ, हमारी आन्तरिक इच्छाएँ,
इच्छाएँ आपसे जुड़े रहने की,
एक डोर से बंधे रहने की ।
जीवन के इस कर्मक्षेत्र में
पुनः मिलकर शस्त्र उठाने की
फिर विजय धुनी रमाने की ।
मंगल कामनाएँ आपके सुखद जीवन की ।
आशाएँ, हमें याद रखे जाने की......

सप्रेम,
-प्रकाश 'पंकज'

(यह कविता हमारे सह-कर्मी के लिए उनकी विदाई के अवसर पर )

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

झूठी है यह "अमन की आशा", फिर काँटों भरी एक चमन की आशा

अमन-अमन हम रटते आये, घाव पुराने भरते आये ,
झूठी पेश दलीलों पर , शत्रु को मित्र समझते आये ।
झूठी है यह "अमन की आशा",  फिर काँटों भरी एक चमन की आशा,
अमन-चैन के मिथ्या-भ्रम में , शीश के मोल चुकाते आये ।  - पंकज

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

शक्ति तुम्हे अब शिव की शपथ- "फिर शक्ति दुरुपयोग न हो"

 
( मेरी नयी कविता 'प्रलय-पत्रिका' की कुछ पंक्तियाँ )

शशिधर  नृत्य करो ऐसा की नवयुग का फिर नव-सृजन हो,
पाप-मुक्त होवे यह जगती, धरती फिर से निर्जन हो,
दसो दिशायें शान्त हो, पुनः वही जन-एकांत हो,
संसकृतियां फिर से बसें, न कोई भय-आक्रांत हो,
और शक्ति तुम्हे अब शिव की शपथ- "फिर शक्ति दुरुपयोग न हो" ।  – प्रकाश ‘पंकज’

फ़िर एक सितारा टूट चला




प्रकृति का अभिशाप मानव



गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर -मेरी पहली कविता




इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर कि धरती पराई लगने लगे,
इनती खुशियाँ भी न देना, दुःख पर किसी के हंसी आने लगे ।

नहीं चाहिए ऐसी शक्ति जिसका निर्बल पर प्रयोग करूँ,
नहीं चाहिए ऐसा भाव किसी को देख जल-जल मरूँ ।
ऐसा ज्ञान मुझे न देना अभिमान जिसका होने लगे,
ऐसी चतुराई भी न देना लोगों को जो छलने लगे ।
इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर कि धरती पराई लगने लगे ।

इतनी भाषाएँ मुझे न सिखाओ मातृभाषा भूल जाऊं,
ऐसा नाम कभी न देना कि पंकज कौन है भूल जाऊं ।
इतनी प्रसिद्धि न देना मुझको लोग पराये लगने लगे,
ऐसी माया कभी न देना अंतरचक्षु भ्रमित होने लगे ।
इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर कि धरती पराई लगने लगे ।

ऐसा भग्वन कभी न हो मेरा कोई प्रतिद्वंदी हो,
न मैं कभी प्रतिद्वंदी बनूँ, न हार हो न जीत हो।
ऐसा भूल से भी न हो, परिणाम की इच्छा होने लगे,
कर्म सिर्फ करता रहूँ पर कर्ता का भाव न आने लगे ।
इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर कि धरती पराई लगने लगे ।

ज्ञानी रावण को नमन, शक्तिशाली रावण को नमन,
तपस्वी रावण को स्वीकारूं , प्रतिभाशाली रावण को
स्वीकारूं
पर ज्ञान-शक्ति की मूरत पर, अभिमान का लेपन न हो,
स्वांग का भगवा न हो, द्वेष की आँधी न हो, भ्रम का छाया न हो,
रावण स्वयम् का शत्रु बना, जब अभिमान जागने लगे ।
इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर कि धरती पराई लगने लगे । – प्रकाश ‘पंकज’




"itni unchai na dena ishwar ki dharati parai lagne lage"
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