मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

छठी माई के घाट पे आके, जग मँगता बन जावे

कातिक आइल, मनवा रोवे, छूटल आपन गाँव,
काँच-महल में एसी डोले, तरसे घर के छाँव!

कातिक चढ़ते सजने लागे, ओसारा-दुआर,
हँसी-ठहाके गूँजे घर में, जुटते रिश्तेदार।
मऊसा-मऊसी, गोतिया-भैया, बैठ लगावें बात,
काँच के बंद कोठरिया में हम, काटें सूनी रात।

जुटके सब घर-आँगन झाड़ें, कोना-कोना लीपें,
चूना-माटी पोत के भीतें, उजली-उजली दीखें।
कड़वा तेल के दीया जगमग, अँधियारी छँट जाई,
फ़्लैट में झालर-बाती बारें, ऊ रंगत न आई।

देवाली जाते-जाते, बरती भीख माँगे जब आवे,
अँजुरी भर-भर गेहूँ माँगें, डगरा-सूप बढ़ावें।
पाँच दुआर पे शीश नवा के, बरतिया हाथ पसारें,
चार देवारन के भीतर हम, सूनी साँझ गुज़ारें।

वही मँगाया गेहूँ धो के, छत पर जब पसरावें,
चिरई-चुनमुन भटक न पावे, लाठी हाथ उठावें।
दिन भर धूप में पहरा रक्खे, जाँत-पिसइया जावें,
नेम-धरम के सेवा में सब, मनवा खूब जुड़ावें।

खरना-साँझ गुड़-खीर, रोटी, केला-पात सजावें,
दम साधे सारा घर बइठा, खटका होये न पावें।
तनिक अवाज कान जो पहुँचे, बरती-कौर ही छूटे,
बारह पहर के निर्जल तप, ई नेम कभी ना टूटे!

गेहूँ पिसते, घाट-डगरिया, झाड़-बुहारें जाके,
घाट किनारे वेदी लींपें, ईख के थंभ लगाके।
काँटा-कंकड़ बीन हटा के, दउरा सीस चढ़ावें,
माथा थके त काँधा बदलें, घाट तलक पहुँचावें।

न महँगे पकवान मँगावें, न छप्पन भोग लगावें,
आदी, मूली, सुथनी, नेमु, सूप-दउरा में लावें।
न कोई बाभन, न कोई पंडा, जात-पाँत मिट जाए,
सीधा कुदरत से बा नाता, 'रोंग नंबर' ना जाए!
सीधा कुदरत से बा नाता, 'रोंग नंबर' ना आए!

सँझिया अरघ के बीते ही जब, भोर-बिहान चल आवे,
लाल किरिन जब फूटे जल पर, मन मँगता बन धावे।
"दे दो मइया छठ परसादी", हाथ पसार नवावें,
ठेकुआ के इक टुकड़े में ही, चारो धाम समावें।

भीख माँग के परब शुरू हो, भीखे परब सिरावे,
भीख नहीं ई नीच बनावे, विनय सिखावन आवे।
हमसे बड़ा भी कोई बईठा, साँच ईहे बतलावे,
परकिरती रूपी छठी मइया, सबके दम्भ मिटावे।

लाट-साहिब भी हाथ पसारे, कोई बड़ा न छोटा,
सूरज-जल के आगे सबके, सिक्का निकलल खोटा।
काँच-महल के ठाठ बिलाए, अँचरा सब फैलावे,
छठी माई के घाट पे आके, जग मँगता बन जावे!

जग केवल चढ़ते सुरुज के, माथ नवावन धावे,
ई परब डूबत सुरुज के, पहिले अरघ चढ़ावे।
जे देके बिसराम लेत बा, ओकर नेह चुकाई,
हाथ जोड़ उपकार मान के, साँचो सीख सिखाई!

ऊँचे-ऊँचे बंद फ़्लैट में, बइठल दिनवा खोईं,
केकरा गोड़ के काँटा बीनीं, केकर दउरा ढोईं?
एसी के एह ठंढी हवा में, घुटत बा हमरो जीया,
लाख कमा के पइसा-कौड़ी, रोवे परदेसिया।

हाथ जोड़ि हम छमा माँगीले, अधमी के अपराध,
अबकी घाट न पहुँचब मइया, मन में रह गई साध।
जग-जंजाल के उलझन बाँधे, कैसी दुनियादारी,
दूर देश से अँखियन के जल, अरघ लेबू महतारी?

लाख कमाए इस परदेस में, खाली हाथ हमारे,
कातिक में जो घर न पहुँचे, ब्यर्थ ये ठाठ हमारे!
कातिक आइल, मनवा रोवे, छूटल आपन गाँव,
काँच-महल में एसी डोले, तरसे घर के छाँव! - प्रकाश 'पंकज'