रविवार, 2 जून 2013

रतियाँ कुहके कोयलिया, दिन मा उल्लू जागे

रतियाँ कुहके कोयलिया, दिन मा उल्लू जागे,
नीति-रीति सब बिसराए दुनिया भागे आगे।

भागे देखो ऐसा की मन मा शैतनवा जागे,
देह-नेह दरकार रे भैया, मन अनुराग न जागे।

अनुराग जे बाप-माए के अब त विषैला लागे,
घर में अकेला बुढ्ढा-बुढ्ढी राह देखे टघुराये।

रतियाँ कुहके कोयलिया, दिन मा उल्लू जागे,
नीति-रीति सब बिसराए दुनिया भागे आगे।

मुँह पर छूछे वाहवाही है मन कोहू न भावे,
भावे तो बस टका-रुपैया, ऐश-मौज करवावे।

ऐश-मौज है चलन रे भैया, शरम काहे को आवे,
मिले जे मौका पंडितो-मोमिन हरिअर नोट उगावे।

महावीर जब नाम सुनावै भूत-पिशाच न आवे,
मानव भीतर भूत-पिशाचन देख कपि मुस्कावे।

रतियाँ कुहके कोयलिया, दिन मा उल्लू जागे,
नीति-रीति सब बिसराए दुनिया भागे आगे।

धन-वैभव के बात न पूछो महिमा अजर-अमर है,
पांडव-कौरव मुँह फुलावत, गरजत महा-समर है।

शकुनी खेले चतुराई, बलि जावत दानी करण है,
धरमराज के झुठलावे अश्वथामा मरण वचन है।

एकलव्य से माँग अँगूठा, गुरु-गरिमा लाज लजावे,
दानी करण के छल के कवछ्वा, देव-धरम शरमावे।

अर्जुन गांडीव न खींचे त मधुसूदन गीता गावे,
देवव्रत के बाण के शय्या किन्नर नाच सजावे।

रतियाँ कुहके कोयलिया, दिन मा उल्लू जागे,
नीति-रीति सब बिसराए दुनिया भागे आगे।

भगत-गुरु-सुखदेव गयो रे फाँसी शीश झुलाते,
भ्रष्टन नेता सुखा दियो रे देश के खाते-खाते।

जनता खेले खून के होली, नेतवन पान चबावे,
बाँट-बाँट के हिन्दू-मुस्लिम, इंग्लिस चाल चलावे।

धधकत देखत प्रह्लाद, होरिका फूफी खूब ठठावे,
माया-मेवा, कौन रे देवा? नर-सिंह कौन बचावे?

रतियाँ कुहके कोयलिया, दिन मा उल्लू जागे,
नीति-रीति सब बिसराए दुनिया भागे आगे।   – प्रकाश ‘पंकज’