सोमवार, 13 सितंबर 2010

उतिष्ठ हिन्दी! उतिष्ठ भारत! उतिष्ठ भारती! पुनः उतिष्ठ विष्णुगुप्त!

मैं हिन्दी का पिछला प्यादा, शपथ आज लेता हूँ,
आजीवन हिन्दी लिखने का दायित्व वहन करता हूँ।


रस घोलूँगा इसमें इतने, रस के प्यासे आयेंगे,
वे भी डूब इस रम्य सुरा मे मेरे साकी बन जायेंगे।

कलम बाँटूंगा उन हाथों को जो हाथें खाली होंगी,
वाणी दूंगा मातृभाषा की जो जिह्वा नंगी होगी।

कल-कल करती सुधा बहेगी हर जिह्वा पर हिन्दी की,
नये नये सैनिक आवेंगे सेना मे तब हिन्दी की।

हिन्दी के उस नव-प्रकाश मे फिर राष्ट्र जगमगाएगा,
माँ भारती की जिह्वा पर अमृतचसक लग जायेगा।

हिन्दी बैठी डूब रही है आज फूटी एक नाव पे,
हम भी तो हैं नमक छिड़कते उसके रक्तिम घाव पे।

हिन्दी सरिता सरस्वती है आज लुप्त होने वाली,
विदेशज भाषा तम-प्रवाह में गुप्त कहीं सोने वाली।

देखो, संस्कृत उठ चुकी अब हिन्दी भी उठ जाएगी,
हिन्द देश के भाषा की अस्मिता ही मिट जाएगी।

उधार की भाषा कहना क्या? चुप रहना ही बेहतर होगा,
गूंगे रहकर जीना क्या? फिर मरना ही बेहतर होगा।

हिन्द के बेटों जागो अब तो हिन्दी को शिरोधार्य करो,
राष्ट्र की गरिमा, मातृभाषा का भी कुछ तुम ध्यान करो

छेत्रवाद की राजनीति मे इस भाषा पर न चोट करो,
हिन्दी मे है श्रद्धा हमारी, कहीं और हो कोई खोट कहो।

पंकज जैसी निर्मल हिन्दी दोष न इस पर डालो,
राष्ट्र एक हो भाषा-सूत्र से अब फूट न इसमें डालो।

आज वाचकों करते आह्वाहन हम राष्ट्र के हर कोने से,
लोकभाषा की थाती ले आओ, रुको न एकत्र होने से।

हिन्दी के इस ज्ञानसागर को हमें आज मथना होगा,
फिर से समस्त बृहस्पतियों को एक माला में गुथना होगा।

उठो भाषा के विष्णुगुप्त फिर चमत्कार दिखलाओ,
विदेशज भाषा अलक्षेन्द्र से हमको त्राण दिलाओ।


जाओ, जैसे भी हो चन्द्रगुप्त फिर एक ढूंढ कर लाओ,
हिन्दी के विविध शस्त्रविद्या से सुसज्जित उसे कराओ

राष्ट्र को बाँधो एक सूत्र मे, फिर धननन्दों का शमन करो,
हिन्दी राष्ट्र-भाषा बने, फिर शिखा को बंधन-मुक्त करो।

पुनः उतिष्ठ विष्णुगुप्त!  उतिष्ठ भारत!  उतिष्ठ हिन्दी! 
उतिष्ठ पंकज!   – प्रकाश ‘पंकज’

* अलक्षेन्द्र : सिकंदर 

और अन्त में शिक्षक जागृति का यह आह्वाहन

17 टिप्‍पणियां:

  1. वाह पंकज जी, बहुत अच्छी रचना है उम्मीद है आगे भी सुंदर रचनाएं पढ़वाएंगे

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  2. उधार की भाषा कहना क्या? चुप रहना ही बेहतर होगा,
    गूंगे रहकर जीना क्या? फिर मरना ही बेहतर होगा।

    bahut hi sundar rachana hian.. ye do line dil ko chhu gayi...........

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  3. आदरणीय प्रकाश पंकज जी
    नमस्कार !
    अत्यंत भावपूर्ण और उद्वेलित करने वाली रचना है…
    हिंदी राष्ट्र भाषा बने …
    हम सब की यहि तो कामना है …
    पुनः आभार एवम् शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  4. atyant utkrisht rachna hai ye. isse shreshth uphaar aur bhent kya hogi aaj k din.

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  5. धन्यबाद आपलोगों का हमारे चिट्ठे पर आने के लिए और मेरी रचना को अपना बहुमूल्य समय देने के लिए...

    आप सबको मातृभाषा हिन्दी दिवस कि शुभकामनाएं...

    हिन्दी लिखें हिन्दी पढ़ें... हिन्दी को उन्नत बनाएँ...

    उतिष्ठ हिन्दी! उतिष्ठ भारत! उतिष्ठ भारती!

    जय हिन्द जय हिन्दी.... मातृभाषा को शत शत नमन

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  6. एक फालतू का सुझाव:
    हिन्दी की सुंदरता उसकी अपनी लिपि में है .... रोमन लिपि में हिन्दी पढ़ने-लिखने में बड़ा कष्ट होता है (यह काम सोनिया जी और उनकी सेना को हीं शोभा देता है ;) )

    देवनागरी में टाइप करना आज उतना हीं आसान है जितना पानी गटकना ... आप जानते हीं होंगे फिर भी कुछ छोड़े जा रहा हूँ

    १. http://www.epicbrowser.com/ भारत का पहला वेब-ब्राउसर जिसमें हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की टाइपिंग का विकल्प है

    २. http://www.google.com/transliterate/ यह हिन्दी टाइपिंग की ऑनलाइन सुविधा..

    ३. http://www.google.com/ime/transliteration हिन्दी टाइपिंग की ऑफलाइन सुविधा जिसका प्रयोग कहीं भी किया जा सकता है नोटपैड, वर्ड इत्यादि

    ... और ऐसे हजारों विकल्प आज हैं हमारे पास हिन्दी को देवनागरी (यूनिकोड) में लिखने के लिए ..
    तो फिर .. हम उधार की लिपि में क्यों लिखें? उधार की भाषा क्यों बोले?

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  7. "अरबी,चीनी, अंग्रेजी,फ्रेँच,रुसी और स्पेनिश"
    ये वो ६ भाषाएँ है जो संयुक्तराष्ट्र की धरोहर है लेकिन हिन्दी नही|
    अपनी मातृभाषा "हिन्दी" का अत्याधिक प्रयोगकर आइये इसे विश्वस्तर का मान दिलवाने मेँ महत्त्वपूर्ण सहयोग दे.

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  8. क्या लिखा है पंकज जी!
    साधो! साधो! अति उत्तम!
    स्वदेशी का अलख जगाने के इस अभियान में मैं भी आपके साथ हूँ.

    जय हिन्द!
    जय हिन्दी!

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  9. बाजारू भाषा नहीं है हिन्दी : आशुतोष राणा
    ===========================================
    कानपुर। हिन्दी ज्ञान की भाषा है और अग्रेंजी व्यापार की भाषा है। आज के भौतिक युग में सफलता व व्यक्ति के विशेष होने का सूचक ज्ञान के बदले व्यापार है।


    हिन्दी को राज-काज की जगह काम-काज की भाषा बनाने पर ही इसका प्रचार बढ़ेगा। गंगा मां को मैला होता देखकर मन दुखी हो जाता है। यह बात सोमवार को अपने गुरू के धार्मिक कार्यक्रम में सहभागी बने फिल्मकार आशुतोष राणा ने बातचीत के दौरान कही।


    आशुतोष राणा ने कहा कि दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है जहां उसकी राष्ट्र भाषा का पखवाड़ा मनाया जाता है। बाजारीकरण के युग में व्यापारी का महात्व है ग्राहक और बाजार का नहीं।


    जब अंग्रेज हमारे देश में व्यापार करने आए थे तो उन्हें व्यापार के लिए हमारी भाषाओं को सीखना पड़ा क्योंकि तब ग्राहक का महात्व था। आज ग्राहक को बाध्य होना पड़ता है व्यापारी की भाषा सीखने के लिए।


    व्यापारी ने अंग्रेजी को अंतरराष्ट्रीय भाषा बनाया है। दुनिया में व्यापारी के द्वारा ही भाषा का प्रचार-प्रसार ज्यादा होता है। भाषा भाव की अभिव्यक्ति का माध्यम होती है और हिन्दी भाषा से अच्छी भावात्मक अभिव्यक्ति कोई भाषा नहीं कर सकती।


    उन्होंने कहा कि हिन्दी सिनेमा का हिन्दी के विकास में विशेष योगदान है। उन्होंने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि राज की भाषा काज की भाषा हो लेकिन काज की भाषा जरूर राज की भाषा होती है।


    कानपुर के बारे में उन्होंने कहा कि यहां आकर मुझे बहुत अच्छा लगा। यहां के लोग बहुत ही श्रद्दावान, भक्तिवान और धार्मिक हैं। यहां के लोगों में धर्म और अर्थ का बहुत अच्छा मिश्रण है।


    आध्यात्मिक रूप से कानुर को मैं बहुत ही सम्पन्न शहर मानता हूं। गंगा में बढ़ रहे प्रदूषण के सवाल पर बोले की गंगा को हम मां कहते है और जब मां अपने दायित्व का पालन हमारे मैल को साफ करके कर रही है तो पुत्र को भी उनको साफ रख कर अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।


    उन्होंने कहा कि जिस तरह से मां अपने रोगी पुत्र को नहीं छोड़ती है उसे पूर्ण स्वस्थ करके ही दम लेती है। उसी प्रकार से पुत्र की भी अपनी रोगी मां को नहीं छोड़ना चाहिए उसे रोग मुक्त करने का प्रयास करना चाहिए। यदि हम गंगा को साफ नहीं रखेंगे तो वो हमें कैसी साफ रखेंगी।
    http://www.bhaskar.com/2010/04/26/kanpur-uttarpradesh-912986.html

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  10. बहुत बढ़ियाँ पंकज जी!आप हिन्दी के ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जो आपकी रचना की सुंदरता में चार चाँद लगा देती है।बहुत मीठी लगने लगती है पढ़ने में।ऐसे ही सुंदर-सुंदर हिन्दी के शब्दों का प्रयोग करते रहें ताकि जो शब्द विलुप्त होने के कगार पर आ चुके हैं उसे फिर से जीवित किया जा सके।आपकी लगन देखकर तो यही लगता है कि जल्द ही हमारी मातृभाषा हिन्दी अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त कर लेगी।
    और रोमन लिपि में लिखने वाले लोगों से मैं यही विणती करता हूँ कि कृप्या देवनागरी में ही लिखें चाहे जैसे भी हो क्योंकि इस तरह की रचना में रोमन में की हुई टिप्पण्णी सुंदर चेहरे पे एक धब्बा सा प्रतीत होता है जो सुंदरता को घटा देता है।

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  11. bahut sahi likha aapne pankajji...aur uske sath ka video to udvelit karne k liye paryapt hai....!! Samarthya ka hona aavashyk hai apne aur rashtr k jeevan moolyo ki raksha k liye....sattaon se adhik mahatvapurna hai rashtr,aur har party k karyakartaon ko ye baat samajhni chahiye,parivartan aayega...!!

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