गुरुवार, 23 सितंबर 2010

दिनकर जी के जन्म दिवस पर एक कवितांजलि: ईश्वर के काव्यदूत

राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह 'दिनकर' जी के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर मेरी और से एक कवितांजलि :


               "ईश्वर के काव्यदूत "

ओ ईश्वर के काव्यदूत तुम फिर से मही पर आओ,
मानवता फिर सुप्त हो चली आकार उसे जगाओ।

जननी के माथे पर अब भी लटक रही तलवारें,
रोज रोज सुनते रहते हम शत्रु की ललकारें।

कहीं धमाका-आगजनी, फिर कहीं खून की होली,
आतंकित हैं लोग यहाँ, सूनी माँओं की झोली।

सिंहदन्त से गिनती सीखे, अब वैसे शूर नहीं हम,
राष्ट्र जो बांधे एक सूत्र में, लौह-पुरुष नहीं हम।

आ जाओ अब हममें उतना साहस नहीं बचा है,
भरत के पुत्रों के वक्षों में पावक नहीं बचा है।

आओ आकर राष्ट्र जगाओ, भरो प्राण में शक्ति,
राष्ट्रद्रोह की कील उखारें माँ भारती की भक्ति।

धधकानी होंगी तुमको फिर वैसी ही ज्वालायें,
जिस ज्वाला से दीप्त हुई थी स्वाधीनता की राहें।   
– प्रकाश ‘पंकज’

10 टिप्‍पणियां:

  1. आज ऐसे ही आहवान की जरूरत है……………दिनकर जी के जन्मदिन की बधाई।

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  2. बहुत खूब पंकज भाई ........... दिनकर जी के जन्मदिन कि बधाई

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  3. दिनकर जी के जन्मदिन पर आपकी रचना से बड़ी भेंट क्या हो सकती है.

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  4. aap bahut achcha likhate hain...
    my best wishes..
    o ishwar ke kavyadoot...aaye hain... dinkar ji.. pankaj ke roop me aye hain..

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  5. @ कुलवंत जी : बहुत बहुत धन्यबाद हमारे चिट्ठे पर आने के लिए हमारी रचनाएँ पढने के लिए और टिपण्णी डालने के लिए ..... पर अपने वो कह दिया जो सही नहीं है , दिनकर जी की तो चरणधूलि भी होना बहुत गर्व की बात होगी मेरे लिए .... हम तो वो भी नहीं ...

    साभार..

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  6. दिनकर जी के जन्म दिवस पर नमन!! आभार इस प्रस्तुति का.

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  7. बहुत बढ़िया.
    दिनकर जी के जन्म दिवस पर नमन!!

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  8. बेहतरीन देशभक्ति से ओतप्रोत कविता
    जय हिंद

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