रविवार, 24 अक्तूबर 2010

जठराग्नि तुम्हें सारे अधिकार देती है।


जठराग्नि तुम्हें सारे अधिकार देती है।

भूखे हो? हाथ खाली हैं?
जिनके हाथ भरे हैं उनसे लो, छीनो, खाओ,
कोई पाप न लगेगा।
घबराओ मत, भूख तुम्हें सारे अधिकार देती है ।

जीने का अधिकार सबको है,
प्राकृतिक सम्पत्ति और उनसे जनित सारी सम्पत्तियों पर
सबका बराबर अधिकार है ।

भूखों! उठ्ठो!
खा जाओ समाज में फैली सारी असमानताओं को।

धर्म, नारी-मुक्ति, दलित-मुक्ति के नाम पर
राजनितिक  व्यापार करने वालों,
पहले क्षुधा-मुक्ति दिलाओ,
नहीं तो एक दिन यही भूख तुम्हें निगल जायेगी,
खा जायेगी तुम्हारी सत्ता को।

और डार्विन, एक दिन भगत फिर पैदा होगा 
और तेरे उस "सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट" वाले 
कुरूप सत्य को झुठला कर चला जायेगा।   – प्रकाश 'पंकज'

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही उम्दा रचना है, भूख आज की एक अहम समस्या है...

    उत्तर देंहटाएं
  2. धन्यबाद आर्यन जी : भूख एक चिरस्थायी सामाज्य है जो कई सदियों से चाली आ रही है ... पर अब ये बात इतनी आम हो गई है कि लोगों को इसकी आदत सी हो गई है .. ना कोई सोंचता है ना किसी को फुर्सत है इसपर विचारने को ....

    सिर्फ जो भूखे हैं .. वही उस क्षुधा का स्वाद जानते हैं ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    बहुत देर से पहुँच पाया ..................माफी चाहता हूँ..

    उत्तर देंहटाएं
  4. काफी मार्मिक रचना है....मन भारी भारी सा हो गया... अच्छा लिखते हैं आप...follow किये जा रहा हूँ आता रहूँगा..मेरी रचनाओं पर भी आपका स्वागत है....

    उत्तर देंहटाएं
  5. पहले तो इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई स्वीकारें...

    आप मेरे ब्लॉग पर पधारे उसके लिए धन्यवाद... मेरी पोस्ट पर लगा चित्र मैंने नहीं बनाया ... गूगल से लिया है ..

    आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामाएं ....

    उत्तर देंहटाएं
  6. sorry i got that wrong ...aako meri rachna pasand aayi uske liye aapka bahut bahut dahnyawaad

    ज्योति पर्व के अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  7. पंकज यह सिर्फ कविता नहीं .आवाहन है. घोष बने भूख के खिलाफ .भोजन के अधिकार को पाने का सीधा रास्ता !
    जय हिंद !

    उत्तर देंहटाएं

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.