रविवार, 19 दिसंबर 2010

प्रलय पत्रिका: शिव जाग मनुज ललकार रहा

झिझक रहे थे कर ये कभी से 'प्रलय-पत्रिका' लिखने को,
आज वदन से सहसा निकला - "अब धरती रही न बसने को"।
रोक न शिव तू कंठ हलाहल, विकल रहे सब जलने को,
दसमुख कहो या कहो दुश्शासन, तरस रहे हम तरने को ।।

शिव देख मनुज ललकार रहा, शिव देख मनुज ललकार रहा,
अस्तित्व ही तेरा नकार रहा , शिव जाग मनुज ललकार रहा।
तुम क्या संहारक बनते हो? प्रलय मनुज स्वयं ला रहा।
तुम क्या विनाश ला सकते जग में? विनाश मनुज स्वयं ला रहा।
शिव जाग मनुज ललकार रहा, शिव देख मनुज ललकार रहा।

चिर-वसुधा की हरियाली को तार-तार जब कर डाला,
निर्मल पावन गंगा को मलित पाप-पंकिल कर डाला,
स्वच्छ, स्वतंत्र प्राण-वायु में विष निरंतर घोल रहा,
है हम सा संहारक कोई? अभिमान मद डोल रहा।
शिव जाग मनुज ललकार रहा, शिव देख मनुज ललकार रहा।

सुजला सुफला कहाँ रही अब पावन धरती माता अपनी,
ऐसा कपूत पाया था किसने जो संहारे माता अपनी?
सुर-सरिता-जीवनधरा कैसी? अश्रु-धारा बस बचे हुए हैं,
समीर कहाँ अब शीत-शीत, शुष्क वायु बस तपे हुए हैं।
हे कैलाशी, अब बतलाओ - विनाश को अब क्या बचे हुए हैं?
हम भी तुम सम विनाशकारी, यह मूक भाषा में बोल रहा।
शिव जाग मनुज ललकार रहा, शिव देख मनुज ललकार रहा।

एक था भागीरथ जिसने, जग में गंगा का आह्वाहन किया,
उग्र-वेग संचित कर शिव, तुमने धरती को धीर-धार दिया।
निर्मल-पावन सुर-गंगा में जगती के कितने ही पाप धुले,
पर पाप धर्म बन गया जहाँ पर, पाप धोना हो कठिन वहाँ पर।
पाप-पुंज बन गयी है गंगा, शील-भंग अब हुआ है उसका,
गंगाधर, शिखा की शोभा को, मानव कलंकित कर रहा।
शिव जाग मनुज ललकार रहा, शिव देख मनुज ललकार रहा।

क्या तू शशिधर है सच में ? तो देख शशि भी है इनके वश में।
यह सुनकर मन कभी हर्षित होता था - "मानव मयंक तक पहुँच चुका है",
फिर चिर-विषाद सा हुआ है मन में, किसका तांडव हो रहा है जग में ?
धरती की शोभा नाश रहा,  शशी-शोभा-नाश विचार रहा,
भविष्य झाँक और फिर बतला - कैसा तेरा श्रृंगार रहा ?
शिव जाग मनुज ललकार रहा, शिव देख मनुज ललकार रहा।

कितने उदहारण दूँ मैं तुझको, लज्जित तू हो जाएगा,
तू क्या संहारक कहलायेगा?
अमरनाथ का लुप्त होता हिमलिंग
सुनी थी मैंने अनगिनत ही कीर्तियाँ ज्योतिर्लिंग अमरनाथ की,
मन में श्रद्धा, भक्ति में निष्ठा, ले करते सब यात्रा अमरनाथ की,
कितने ही लालायित भक्त, उस हिमलिंग का दर्शन करते,
प्रान्त-प्रान्त से आते उपासक, अपना जीवन धन्य करते।
पर हिम शिखा पर बसने वाले, भांग धतुरा रसने वाले,
इस तपती धरती पर अब, तू एक हिम लिंग को तरस रहा।
शिव जाग मनुज ललकार रहा, शिव देख मनुज ललकार रहा।

हे पिशाच के गण-नायक, हे रावण-भक्तिफल-दायक,
पिशाचमयी मानव यहाँ सब, मानवमयी रावण यहाँ सब।
अब राम एक भी नहीं धरा पर, क्या होगा अगणित रावण का ?
रावण संहारक लंका का तो मानव संहारक निज-वसुधा का।
तुम सम शक्तिमयी हम भी हैं, सुन देख दशानन हूँकार रहा।
शिव जाग मनुज ललकार रहा, शिव देख मनुज ललकार रहा।

कब तक रहोगे ध्यान-लीन, कर रहे तुम्हे सब मान-हीन।
अधर्म-ताप तप रहा है व्योम, पाप-ताप तप रही है धरती,
मानवता मानव से लड़ती, मृत्यु संग आलिंगन करती।
अब शक्ति-पट खोल हे शिव, त्राण को तरस रहे सब जीव,
यह पाप-पंकज धिक्कार रहा - "अरे कैसा तू दिगपाल रहा?"
शिव जाग मनुज ललकार रहा, शिव देख मनुज ललकार रहा।

नटराजन नृत्य करो ऐसा की नवयुग का फिर नव-सृजन हो,
पाप-मुक्त होवे यह जगती, धरती फिर से निर्जन हो,
दसो दिशायें शान्त हो, पुनः वही जन-एकांत हो,
संसकृतियां फिर से बसें, न कोई भय-आक्रांत हो,
और शक्ति तुम्हे अब शिव की शपथ- "फिर शक्ति दुरुपयोग न हो"।  – प्रकाश ‘पंकज’

* कर: हाथ
* वदन: मुख

* चित्र: गूगल साभार

25 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. इस सुंदर रचना के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद...आने वाले कल के लिए ढेर सारी शुभकामनाए...

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  3. दैनिक भास्कर पर आशुतोष राणा का साक्षात्कार जरूर पढ़ें ..
    इसमें उनके हिन्दी और गंगा के प्रति श्रद्धा झलकती है
    http://www.bhaskar.com/2010/04/26/kanpur-uttarpradesh-912986.html

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  4. बाजारू भाषा नहीं है हिन्दी : आशुतोष राणा
    कानपुर।
    कानपुर के बारे में उन्होंने कहा कि यहां आकर मुझे बहुत अच्छा लगा। यहां के लोग बहुत ही श्रद्दावान, भक्तिवान और धार्मिक हैं। यहां के लोगों में धर्म और अर्थ का बहुत अच्छा मिश्रण है।


    आध्यात्मिक रूप से कानुर को मैं बहुत ही सम्पन्न शहर मानता हूं। गंगा में बढ़ रहे प्रदूषण के सवाल पर बोले की गंगा को हम मां कहते है और जब मां अपने दायित्व का पालन हमारे मैल को साफ करके कर रही है तो पुत्र को भी उनको साफ रख कर अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।


    उन्होंने कहा कि जिस तरह से मां अपने रोगी पुत्र को नहीं छोड़ती है उसे पूर्ण स्वस्थ करके ही दम लेती है। उसी प्रकार से पुत्र की भी अपनी रोगी मां को नहीं छोड़ना चाहिए उसे रोग मुक्त करने का प्रयास करना चाहिए। यदि हम गंगा को साफ नहीं रखेंगे तो वो हमें कैसी साफ रखेंगी।

    http://www.bhaskar.com/2010/04/26/kanpur-uttarpradesh-912986.html

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  5. बहुत अच्छी रचना|
    पढते पढते बचपन की एक कविता विप्लव गान याद आ गयी|
    इस सुन्दर रचना के लिए धन्यवाद|

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  6. hamesha achha aur sachha likhte raho... bahut shubh~kaamnayein!!

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  7. बहुत खूब .. सच में आज कितने ही रावण हैं विनाशक के रूप में ... आदम जात भी तो विनाशक है धेरती की ....

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  8. Pankaj bhai.. bahut sundar kavita... Kash Manav jati is kavita mein chhupe Kavi Hridaya ki Shrishti ke prati vedna ko samajh paye... AttiSundar... Har Manushya k ek baar avashya padhi chahiye....

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  9. वाह वाह ...ह्रदय स्पर्शी रचना....!!! प्रकाश-पंकज जी .....बहुत-बहुत बधाईयाँ ...!!! चित्र भी अद्बूत है भाई...!!!

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  10. झिझक रहे थे कर ये कभी से 'प्रलय-पत्रिका' लिखने को, आज वदन से सहसा निकला - "अब धरती रही न बसने...

    Bahut hi achhi rachna hian......

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  11. ऐसे ही प्रयास करते रहिये. कलम लगातार चलने से ही कलाम में निखार आता है.

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  12. भैया, सब कुछ शिव ही क्यों करें, क्या उन्हों ने कहा है बदमाशी करने को.....करनी तो आपकी है..भुगतें शिव...कुछ आप भी तो करो या बताओ क्या करना है ..सिर्फ़ गाते रहने से क्या होगा...

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  13. इस सुन्दर रचना के लिए धन्यवाद|

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