
यह कैसा प्रकाश जो राह दिखलाता नहीं,
यह कैसा प्रभात जब सूर्य उदित होता नहीं,
यह गुरु कैसा जिसे दक्षिणा की भूख है,
यह शिष्य कैसा जिसे गुरु का आदर नहीं,
वह ज्ञानी कैसा जिसे ज्ञान का अभिमान है,
वह ज्ञानी वैसा जो रावण के समान है,
ज्ञानी रावण के मन में फिर से, अभिमान की कैसी यह उठी उमंग है ।
धरती आसमान हवा ही नहीं इन्सान खुद को शीशे में देख दंग है । - प्रकाश 'पंकज'
यह कविता अनुभूति पर भी प्रकाशित: http://www.anubhuti-hindi.org/nayihawa/p/prakash_pankaj/index.htm
achcha hai dost. bahut hi achcha
जवाब देंहटाएंbilkul sahi likha hai,
जवाब देंहटाएंdhanyabad
बहुत बढ़िया लिखते हैं आप . आगे भी लिखते रहे . धन्यबाद
जवाब देंहटाएंयह कैसा प्रकाश जो राह दिखलाता नहीं
जवाब देंहटाएंयह कैसा प्रभात जब सूर्य उदित होता नहीं
....
सही कहा : न वो गुरु रहे न वो शिष्य , न वो ब्रह्मण रहे न ही उनका वो वेष
जवाब देंहटाएंArre .. yeh tho ekdham rocking hai .. He is future Galib ...
जवाब देंहटाएंPankaj ji great work done by you.....
जवाब देंहटाएंthanks a lot....you are different from other writers...
आप वाकई में बहुत अच्छा लिख रहे है. मेरी बधाई स्वीकार करे. चंद्रपाल,मुंबई chandrapal@aakhar.org
जवाब देंहटाएंpankaj ji, dhanyabaad is amol rachana ke liye.
जवाब देंहटाएंAkanksha Jha