शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

शक्ति तुम्हे अब शिव की शपथ- "फिर शक्ति दुरुपयोग न हो"

 
( मेरी नयी कविता 'प्रलय-पत्रिका' की कुछ पंक्तियाँ )

शशिधर  नृत्य करो ऐसा की नवयुग का फिर नव-सृजन हो,
पाप-मुक्त होवे यह जगती, धरती फिर से निर्जन हो,
दसो दिशायें शान्त हो, पुनः वही जन-एकांत हो,
संसकृतियां फिर से बसें, न कोई भय-आक्रांत हो,
और शक्ति तुम्हे अब शिव की शपथ- "फिर शक्ति दुरुपयोग न हो" ।  – प्रकाश ‘पंकज’

1 टिप्पणी:

  1. दिनकर जी कि कुछ पंक्तियाँ "द्वन्दगीत" से :
    विभा, विभा, ओ विभा हमें दे, किरण! सूर्य! दे उजियाली।
    आह! युगों से घेर रही मानव-शिशु को रजनी काली।
    प्रभो! रिक्त यदि कोष विभा का तो फिर इतना ही कर दे;
    दे जगती को फूँक, तनिक झिलमिला उठे यह अँधियाली।

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